महाशय जयप्रकाश आर्य(maasha jayparkash arya), part2

महाशय जयप्रकाश आर्य(maasha jayparkash arya), 
Part2
मैं 12-13 वर्ष का था। छठी कक्षा में पढ़ता था। मेरे साथियों में
मुझे भी बीड़ी पीने की आदत पड़ गई थी। सुबह-शाम संध्या हवन आय
में
समाज में आते थे। कुश्ती-व्यायाम आदि करते थे। महाशय जी को पता
लगा कि कुछ बच्चे बीड़ी पीते हैं। उन्होंने संध्या के समय बड़े प्यार से पूछा
और समझाया। हमारे सभी दुर्गुण दुर्व्यसन छुड़वाये। श्रद्धा के योग्य
पूज्यनीय महाशय जी ने हम पर बड़े उपकार कर रखे हैं जिसे मैं जीवन भर
नहीं भुला सकता।

एक बार मस्तापुर गांव के बाहर कुंए की मेढ़ पर सांग हो रहा था।
आर्य वीर दल का उस समय गठन हो गया था। हमें 10-15 नौजवानों को
तैयार करके कहा कि सांग बन्द करवाना है। हमने कहा कि गांव वाले हमें
पीटेंगे। बोले तुम आपस में ही लाठी मारना शुरू कर दो, वे समझेंगे कि
झगड़ा हो गया है। हमने वैसा ही किया। लाठी बजते देख भगदड़ मच गई
और सांग बन्द हो गया। उसके बाद कोई सांग नहीं हुआ। इसी तरह से
आर्य वीर दल के सैनिकों को भैरू मेले में ले जाकर गुण्डागर्दी का अन्त
किया।
वे एक कुशल वैद्य भी थे। कई महिलाएं औषधि दिलाने अपने
बच्चों को लाती तो बच्चों का टेलीफोन बनाकर बोलती कि बाबा मेरे
बुखार हो रहा है। छोटा बच्चा बोलता थोड़े ही है। महाशय जी ऐसी देवियों
को कहते बेटा ! जो कुछ तू बोल रही है वह मुझे सुन रहा है बीच में बच्चे
का उपयोग मत करो। मैं तो पिता समान हूँ, बोलने व दुख बताने में कोई
हर्ज नहीं है। वे पर्दा प्रथा के विरोथी थे।
44 धर्मयुद्ध ' भाग्यनगर हैदराबाद निजाम की जेल में कई दिल
रहे। वहां साबुन, चूने का पानी आदि पिलाया गया। आटे में भी मिलावट
की, इसी वजह से उनको वहां से हृदय रोग मिला।
1978 में महाशय जी बीमार हो गए और सफदरजंग अस्पताल,
दिल्ली में भर्ती थे। उन दिनों मैं दिल्ली पुलिस स्टेशन, डिफेंस कॉलोनी में
सेवारत था। अस्पताल मेरे नजदीक था इसलिए प्रतिदिन उनसे मिलता
था। एक दिन मैं गया तो भाई क्षेत्रपाल ने बताया कि सुबह से कुछ भी
नहीं खाया-पीया, पानी भी नहीं। डॉक्टरों से कहा तो बोतल लग गये।
बोले, घर ले चलो, नहीं तो भूख हड़ताल शुरू। मैंने कहा अब बिल्कुल
मानने वाले नहीं हैं। उन्होंने भूख हड़ताल सफल करके, घर पहुंचकर ही
पानी पिया।
उनका सादा जीवन, सादा खाना, मीठा बोलना, सहज, सरल
स्वच्छ जीवन था। वे आर्य समाज का इतना बड़ा कार्य कर गए, बड़ी
हिम्मत की बात है। धेला पास में नहीं था परन्तु कंगाल भी नहीं थे। उन्होंने
अनेकों आर्य समाज व गुरूकुल स्थापित कराये। मैं नहीं बल्कि सारा
इलाका उनका ऋणी है।

मेरे गांव के नौजवान मुझसे कहने लगे कि हमने सुना है कि एक
आर्यवीर आर्यों को लाठी सिखाता है ? हम भी लाठी सीखेंगे। मैं उनकी
इच्छा समझ आर्य समाज बीकानेर आया और महाशय जी से प्रार्थना की कि
हमारे गांव गणियार में भी लाठी का कैम्प लगायें। मेरी बात सुनकर झोला
उठाकर साथ चल दिये। अगले ही दिन बंजर भूमि में कैम्प लगा दिया। 20
नौजवान देखते-देखते ही भर्ती हो गये। दोनों समय सन्ध्या हवन, दिन म
लाठी सिखाते फिर रात को गांव में प्रचारक करते। इतना सब करक
महाशय जी को मैंने कभी थकते नहीं देखा।
हमारे गांव से 3 मील दर अफ का मेला भरता है। मेले में ।
अनाप-शनाप बेहद भरे गाने गाते। महिलाओं से हरकते करते थे।
वीर दल के सैनिकों के साथ महाशय जी मेले में जा विराजे और बदमाशों|
को ठीक किया। परम पिता परमात्मा से प्रार्थना है कि ऐसी महान् आत्मा को |

भेजकर आर्य जगत का उत्थान करायें।

Post a Comment

Please do not inter any spam link in the comment box

नया पेज पुराने