जिसमें रुचि(jsma Ruchi)part2

जिसमें रुचि(jsma Ruchi)
Part2
जीवन में सुख-शांति हासिल करने के लिए हमें ईश्वर के विषय में
उत्पन्न करनी चाहिए, आत्मा के विषय में रुचि उत्पन्न करनी चाहिए कि के
है। मन, बुद्धि इन्द्रियों के विषय को जानने में रुचि करनी चाहिए। तभी हम ।

तनाव, दु:ख से बचे रह पाएंगे और सच्चे सुख को प्राप्त कर पायेंगे।

(24) 'मन नियंत्रण समस्या का एक समाधान है:

'दम' का आचरण समस्याओं को दूर करता है।
समस्याओं के समाधान का धार्मिक, दार्शनिक, आध्यात्मिक उप
सका नाम है- दमन' छोटा सा शब्द है दमन 1 लेकिन यह कितना ।
कितना महत्वपूर्ण है, इसे जान लें। यदि इसकी परिभाषा को ठीक प्रकार से व्य
समझ ले और दमन की स्थिति को प्राप्त कर ले तो उसे कई समस्याएँ छ ।
पाती, ये निश्चित बात है।

दमन का अर्थ है- मन के अंदर उत्पन्न होने वाली विभिन्न प्रकार
प्रतिकूलताओं से सम्बन्धित जो वितर्क (हिंसा, झूठ, चोरी आदि) है, जो क्लिष्ट
(बुरी) वृत्तियाँ (अविद्या आदि) हैं, जो प्रतिशोध की भावना है, एवं क्षोभ (अस्मिता
की भावना है, उन सबको सहन करना।

दम का अर्थ है- दमन करना। अर्थ निकल सकते हैं, इन्द्रियों का
दमन करना, मन का दमन करना, इच्छाओं का दमन का, वाप्तनाजे
का दमन करना, संस्कारों का दमन करना। इच्छाओं का विघात छोे एक
व्यक्ति दुखी होता है। इच्छाओं को जो व्यक्ति मार देता है, कम है।
देता है, वह समस्याओं से मुक्त हो जाता है। ऐसा कुछ शेर है-"चाह गई
चिता गई, मनवा बेपरवाह, उन्हें कुछ न चाहिए, वे शाहों के शाह'। यही ।
सांख्य दर्शन में बताई गई है कि-"निराशा सुखी पिंगला।।

प्राय: होता यह है कि जब भी व्यक्ति प्रतिकल परिस्थितियों का सम
करता है या उसके सामने प्रतिकूल परिस्थितियाँ आती हैं, तब जैसा वह
उस प्रकार का कार्य नहीं होता है। इससे उसके मन के अंदर क्षोभ उत्पन्न
निराशा उत्पन्न होती है,और फिर क्रोध उत्पन्न होता है। इसका परिणाम य
निकलता है कि वह व्यक्ति अपनी उस
की सहन न करके अन्दर
अन्चर दु:ख और ट्वेष की अग्नि में जलता रहता है, दुखी होता रहता है और अपने
विवेक, धैर्य और सहनशीलता को खोकर अनिष्ट चिंतन करता है, अनिष्ट (दुष्ट)
वाणी का प्रयोग करता है, अनिष्ट कार्यों को कर देता है। इस तरह वह अपना
विनाश करता है, अपने परिवार वालों का विनाश करता है, अपने पदोसी-मित्रो=
संबंधियों का विनाश करता है, समाज का विनाश करता है और राष्ट्र का मी
(विनाश करता है। यहाँ तक कि विश्व का भी विनाश करता है।

इन समस्याओं के समाधान के लिये एक बड़ा उपाय है अपने मन के
र नियंत्रण करना, मन में उत्पन्न होने वाले वितको को दबाना। जैसे =
लोहे को खींचता है, ठीक वैसे ही प्रतिकूल परिस्थितियाँ व्यक्ति के मन को
आंदोलित कर देती है। वे उसको रजोगुण से युक्त बना देती हैं, उसे उत्तेजित
चंचल) कर देते हैं, कुपित कर देती हैं। उस समय दौर्मनस्य (क्षोभ) की स्थिति
न के अन्दर बन जाती है। व्यक्ति धैर्य और सहनशीलता को खोकर के अनिष्ट
चिंतन करता रहता है, अधर्म के कार्य करता रहता है। इसके विपरीत यदि व्यक्ति
प्रतिकूल परिस्थितियों के समक्ष उपस्थित होने पर अपने मन पर नियंत्रण कर ले

तो समस्या उत्पन्न होती ही नहीं।

(25) प्रयत्न देवता है, सफलता का साधन है, इसलिये हे मनुष्य,
कर प्रयत्न, और पा सफलता

सफलता के लिये प्रयास जरूरी है।

सामान्य जीवन में प्राकृतिक प्रकोपों को हम टाल नहीं सकते। आप प्राकृतिक
प्रकोपों को छोड़ दीजिए। जिस समय में छम १८ के १6 घंटे शांत, प्रसत,

सुखी और संतुष्ट ग्रह सकते हैं। यह हमारे हाथ में है कि हमारे मन में एक भी
दुर्भावना उत्पन्न न हो, अहिंसा, सत्य आदि यम-नियम के विरुद्ध आचरण (विर्तक)
न हो। सतत ईश्वर की आज्ञा में हम चल सकते हैं।

यह जरूर है कि इसके लिए पहले प्रयास करना पड़ता है। अपने सामर्थ्य
शक्ति को देखकर के काम करना पड़ता है। कोई भी कार्य जो ऐसी स्थिति ।
बाधक है, उसको छोड़ना पड़ता है। चाहे वह कार्य भोजन ही क्यों न हो, चा
लिखना क्यों ना हो, चाहे पढ़ना क्यों ना हो। दस इन्द्रियों पर संयम करके जित
कार्य कर सकते हैं, उतने कार्य को करना पड़ता है।

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