जिसमें रुचि(jsma Ruchi)



जिसमें रुचि(jsma Ruchi)
व्यक्ति की जिस किसी विषय में विशेष रुचि होती है, प्रेम होता है, निष्त
होती है विश्वास होता है जो विषय उसे लाभकारी प्रतीत होता है ।
ना है, जिसे या
उपयोगी, सुखदायी और महत्वपूर्ण मानता है, वह उसके विषय में विचारता है ।
उसके विषय में योजनाएं बनाता है, उसी को प्राप्त करने, उसी की रक्षा करने
रुचि
में
उसी को खाने और उसका उपयोग करने के लिए पूर्ण पुरुषार्थ-
करता है। व्यक्ति
हहैं ि
की सारी शक्ति उस महत्वपूर्ण विषय मे लग जाती है। उदाहरण के लिए
को खाने में रुचि होती है। वह व्यक्ति खाने के विषय में विचारेगा, चिंतन करेगा कि।
की
क्या खाऊं, किसना खाऊं, कैसे खाऊं, कैसे मिलेगा, कैसे साधनों को प्राप्त करू।
इसमें वह पूरी शक्ति लगा लेता है। किसी को शब्द के विषय में किसी को
में
विषय में, किसी को रूप के विषय में, किसी को गंध के विषय में किसी को
विषय में विशेष रुचि होती है। ये पांच विषय है इन्द्रियों के। ऐसे ही आ
में
विषय के बारे में जान लें। आध्यात्मिक विषयों में जिसकी रुचि होती है तर
प्रक
उसी विषय में अपनी पूरी शक्ति लगा देता है। चाहे ईश्वर हो, चाहे आत्मा हो ।
तपस्या हो चाहे सेवा हो या परोपकार हो या अध्ययन हो, चाहे लेखन हो कोई आ
विषय हो, वहीं अपनी पूरी शक्ति लगा देता है।
तप

इससे यह सिद्धांत हमारे सामने आता है कि हमारी आध्यात्मिक विधये
मे विशेष की नहीं है, इसलिए उनके प्रति विशेष प्रयाप्त नही को है।
चिंतन नहीं करते हैं, समय नहीं लगाते है, शक्ति नहीं लगाते हैं, बल का प्रयोग नहीं
भी
करते हैं। उस विषय में रुचि न होने का कारण उसमें विश्वास न होना, श्रद्ध न नहीं
होना लाभकारी होने की अनुभूति नहीं होना है, उसकी उपयोगिता प्रतीत नहीं होना
है, उसके महत्त्वों को न समझना है। चाहे ईश्वर हो, चाहे समाधि हो, चाहे की
विवेक-वैराग्य हो, चाहे मौन और गंभीरता हो, चाहे यम-नियम का पालन हो, चाहे कि
आदर्श दिनचर्या हो, चाहे सात्विक भोजन हो, चाहे इन्द्रियों पर संयम हो, चाहे की
एकांत सेवन हो, चाहे निष्कामता हो, इस प्रकार कोई भी आध्यात्मिक विषय आप यः
ले सकते है।
प्रेज

जिन-जिन विषयों में हमारा अधिक प्रेम है, रुचि है, श्रद्धा है, निष्ठा है। श
विश्वास है, जो लाभकारी प्रतीत हो रहे हैं, उनमें हमारी प्रवृत्ति होने लगती है। कहा को
भी है- जहाँ चाह, वहाँ राह।

(22) अति’ नाश का कारण है अतः अति’ को सर्वत्र छोड़ दिए
नेहा के अनुकूल कलर करके चढिए, क्योंकि:-
समस्या-समाधान
रुचि का अतिरेक दिनचर्या को असंतुलित

करता है।

घर-यार छोड़ कर क गुरुकुल में आने वाले प्रचारकों की अलग
रुबि मिलेगी। यहां गुरुकुल में ऐसी प्रवृत्ति हम चलने नहीं देते हैं। जिन गुरुकुलों
करते हैं वह व्यक्ति व्यायाम में इतना बल लगाते
गत-दिन व्यायाम में लगे रहते हैं। वे दण्ड बैठक लगाते ही जायेंगे।
रिंग। वे सुबह प्रतीक्षा करते रहते हैं कि कब सायंकाल आयेगा, व्यायाम
एंटी बजेगी और व्यायाम करेंगे। ऐसे ही कब खाने की घटी बजेगी और जब
टकर खायेंगे और कब सोने की घंटी आयेगी, खूब जमके सोयेंगे। कुछ गुरुकुलों
में विद्यार्थी बस व्यायाम करते रहेगे, खेलते रहेगे, खाते रहेंगे, पर न उनको बोलना
देवता है न उनको लिखना आता है, न कोई व्यवहार करना आता है। उनके जीवन
ॐ न कोई ईश्वरप्रणिधान है, न कोई उपासना है, न कोई अध्ययन है, न कोई
प्रवचन है, न कोई सेवा परोपकार है। बस ऐसे ही शरीर में मॉस इकट्ठा करते
रहते हैं। जिनकी अध्ययन में रुचि होती है, वे किताबी कीड़े की तरह लग जाते हैं
और पुस्तकों के बीच में पड़े रहते हैं। उन्हें न व्यायाम करना, न भोजन करना न
तपस्या करनी है। ऐसे ही उपासना के विषय में भी अति हो सकती है। वे दिनभर
अपने काम में मस्त रहेंगे बस, अपने एकांत में रहेंगे, अपना ध्यान करेंगे और
अपने कार्यों को करते रहेंगे, भोजन भी करते रहेंगे, व्यायाम भी करते रहेंगे, कपड़े
भी धोते रहेंगे, लेकिन सेवा–परोपकार के कार्य में कुछ नहीं करेंगे, अध्ययन भी
नहीं करेंगे। वे एकांकी होते हैं।

गुरुकुलों में किसी को व्यायाम में रुचि होती है, किसी की अध्ययन में, किसी
की नेता बनने में रुचि होती है, किसी की प्रवचन देने में, किसी की व्यवस्था में,
किसी की बाहर घूमने में, किसी की चर्चा करने में, किसी की हराने में और किसी
की निंदा-चुगली करने में रुचि होती है। ये उदाहरण मात्र हैं। सिद्धांत हमारे पास
यही आया कि जिस विषय में रुचि होती है, व्यक्ति की श्रद्धा, निष्ठा,
प्रेम, विश्वास आदि-आदि बने होते हैं, उस विषय में व्यक्ति अपनी पूरी
शक्ति लगा देता है। उसके विषय में बल लगाता है, पुरूषार्थ करता है, साधनों
को जुटाता है और कार्य करता है।
(23) प्रत्येक व्यक्ति की रुचि एक दूसरे से भिन्न लेती है। में किस
विषय में रुचि कंपनी करनी चाहिए, यह आचार्य बताते हैं
समस्या समाधान

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