जिसमें रुचि(jsma Ruchi), part9

जिसमें रुचि(jsma Ruchi), 
part9
स्वर्गीय पदार्थ को, जो जीवन को सुखमय बनाता है, बड़े
धन्यवाद पूर्वक ग्रहण करना उचित है । हम लोगों को यह
विचार न केवल भूल है कि जिस मनुष्य की हम सेवा करें,
उसे इसके प्रतीकार में हम से स्नेह तथा हमारी सहायता करनी
चाहिए । प्रेम का आशय यह है कि जिसके प्रतीकार में किसी
सांसारिक वस्तु की लालसा न की जाय । मैंने अपने आप ही
यह मिथ्या अर्थ समझ उसके सुखों को यह नीच दर्जा दे दिया
था । इसी कारण जब जब ये सुख प्राप्त न हुए, मैं निराश हो
बैठा, मानो मैंने यह स्वयं मान लिया कि जीवन के उद्देश्य में
सुख या दु:ख पड़ने पर परिवर्तन हो सकता है । आपत्तियों का
विचार र मैंने अपना जीवन मार्ग बदल दिया, जिसका
परिणाम यह हुआ कि आत्मा के अमरत्व में मुझे पूरा विश्वास

रहा । मुझ में उस दृढ़ विश्वास की कमी पाई गई जिसके
द्वारा मनुष्य जीवन में आवागमन नियत किया गया है, जिसमें
एक योनि की कठिनाइयों से निकल कर मनुष्य दूसरी योनि की
विपत्तियों में प्रविष्ट होता है । मनुष्य की आत्मा जीवन के
आवागमन में जकड़ी हुई है । वह प्रत्येक जीवन में उन
मानसिक भावों में उन्नति करती रहती है जो इस संसार में एक
बीज के समान हैं । मुझे ज्ञान हुआ कि मेरे किये हुए कार्य उस
मनुष्य के समान हैं जो यह विचारता हुआ सूर्य के अस्तित्व में
शंका करने लगता है कि वह अपने लैम्प को उसकी किरणों
से प्रकाशित न कर सका । अतएव मैंने यह परिणाम निकाला
कि मैंने अपने दिन कायरता से काटे, और विशेषता यह कि
बिना जाने मुझे मैं उसे स्वार्थ-साधन का शिकार रहा जिससे
मैंने स्वयं अपने को पृथक् समझा था । इसका कारण यह था
कि मैंने अपने जानते इस स्वार्थ साधन को उच्चतम तथा शुद्ध
श्रेणी का समझ लिया था । मनुष्य जीवन एक मिशन है ।
अथवा दूसरे शब्द में यह कहना चाहिए कि एक व्रत है। इनके
अतिरिक्त कोई दूसरा अर्थ समझना सर्वथा भूल है । धर्म,
विज्ञान और दर्शन दूसरे विषयों में चाहे कितने ही परस्पर
प्रतिकूल हों, परन्तु इस बात में सब सहमत हो जाते हैं कि
मनुष्य जीवन का कुछ न कुछ उद्देश्य आवश्यक होता है । यह
न मानने से मनुष्य जीवन में उन्नति या अवनति एक जैसी हो
जाती है, क्योंकि जब मनुष्य जीवन का कोई उद्देश्य ही नहीं तो
उन्नति या अवनति करना किस के लिए कहा जा सकता है ?
मेरी सम्मति में मनुष्य जीवन का एक यही उद्देश्य हो सकता
है कि मनुष्य अपनी सब इन्द्रियों को इस प्रकार शिक्षित करे
कि जिससे वे अपने दूसरे भाई की सर्वदा सहायता किया करें
और सब इंद्रियां सहमत हो जीवन का नियम बनावें । जब
हम यह कहते हैं कि मनुष्य जीवन का यही एक मात्र उद्देश्य
है तो हमें यह भी कह देना उचित है कि मनुष्य के लिए एक
और उद्देश्य है । चाहे वह किसी समय या किसी अवकाश में
उत्पन्न क्यों न हो इसका एक और उद्देश्य भी आवश्यक होता
है । इसको उद्देश्य नम्बर दो कहना चाहिए । पर यह उद्देश्य
पहले के अधीन था उसी का समर्थन करता है । बहुधा
मनुष्य इस अवस्था में उत्पन्न होते हैं और उनका कर्तव्य या
उद्देश्य इसी में होता है कि अपने समाज का संशोधन करें ।
बहुतेरे मनुष्यों को यह अवकाश दिया जाता है कि वे अपनी
जाति की बिखरी हुई कलों को एकत्र करके जातीयता का स्नेह
आपस में उत्पन्न कर दें, उनकी सामाजिक व्यवस्था को शुद्ध
मार्ग पर लगा दें अथवा किसी प्रकार का राजनैतिक या धार्मिक
उत्साह पैदा कर दें । इटली का एक विख्यात कवि दांते
लिखता है कि जीवन समुद्र के समान जिस पर मनुष्य उन
जहाजों के समान चल रहे हैं जिनको किसी विशेष स्थान या
बंदरगाह में जाना है । यदि मनुष्य जाति अब तक अपनी
बाल्यावस्था में है, और यह निर्णय नहीं कर सकते कि वह
विशेष उद्देश्य क्या है जिसको उन्हें अवश्य प्राप्त करना है,
उनकी इस बात का समर्थन करता है कि उनको अपना जीवन
एक 'जीवन' बनाना, तथा अपने जीवनकाल में स्वयं पवित्र
बनकर दूसरों को पवित्र बनाने की चेष्टा करनी चाहिए

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