जिसमें रुचि(jsma Ruchi), part8

जिसमें रुचि(jsma Ruchi), 
Part8
इन बातों का मुझे उस समय ज्ञान हुआ जब कि लोग मुझ पर
चारों ओर से आक्रमण कर रहे थे। इससे में उस समय अभिज

हुआ जब मुझे उन मित्रों से धीरज पाने की आवश्यकता थी जो
मेरे सब अकारणिक अभिप्रायों को जानते थे, और जो दु:ख
सुख में मेरे सरकार रह चुके थे । ठीक अवसर पर मेरे परम
मित्रा ने मुझे धोखा दिया और सब ने मुझे त्याग दिया।
इस संसार में मेरी माता के अतिरिक्त और कोई मेरा
साथी नहीं दीख पड़ता था । मेरे चित्त में यह शंका उत्पन्न हुई
कि कदाचित् में ही मिथ्या भ्रम में पड़ा होऊ और सारा संसार
सत्य मार्ग पर है। मुझे अपने मानसिक विचार भ्रम से प्रतीत
होने लगे और जान पड़ने लगा कि उनमें सत्य लेशमात्र नहीं है।
मुझे अपने सब कार्य स्वार्थ लाभवश प्रतीत होने लगे और यह
जान पड़ने लगा कि मैं जीत के लिए इस संसार में यों भटक
रहा हूँ । कदाचित् मैंने स्वार्थ साधन के हेतु अपने मनोविकार
को एक उच्चतम भाव देकर अपने चित्त को उन मनोकामनाओं
से फेर लिया हो जो सहज में सिद्ध हो सकती थी । जिस दिन
मेरे हृदय में ये शंकाएं उत्पन्न हुई, उस दिन मैं बड़ा उदास था
और मुझे जान पड़ता था कि मैं किसी ऐसे दोष का भागी हूं
जिसका कोई मार्जन नहीं । जो मनुष्य किस कन्द्रिया तथा
चेतावनी की रणभूमि में गोलियों से मारे गये थे, उनका भयंकर
दृश्य मेरे नेत्रों के आगे घूमने लगा और मुझे प्रतीत होने लगा
कि इस सब प्राणी वध की हत्या मेरे सिर है। मेरे ही कारण इतने
प्राण नष्ट हुए । यदि मैं इसी प्रकार इटली के युवकों के हृदय
में स्वतन्त्र सम्मति का अंकुश उत्पन्न करता रहा तो ऐसे ही न
जाने कितने प्राणी नष्ट होंगे । कदाचित् मेरा यह भ्रम ही हो
और परमेश्वर की यह इच्छा हो कि इटली अब अपने से निम्न
जातियों के अधीन होकर रहे, न संसार में प्रशंसा को प्राप्त हो
और न पृथ्वी तल पर किसी कार्य के योग्य हो । मुझ में यह
'सती कदाचित नहीं आ सकती कि मैं भविष्य के विषय में
"पख से एक अनुमति ठहरा सकूं और अपनी उस आगमवाणी
उच्ता है । उरघों शनाब्दे के पौले्कयार के पद को
शलेह अज्ञया जो दो बाजार उप े पोले विवाह दिखा है
= जा - ॐ = ओर का सार विचार
ल्यों है जैला के ऊेती जकाल के जुूमेरजक वजुष्य स्इते थे।
== == = = जाने के बाद होने का भो पही
ष स ध प है कि इस पारि
जो ओड मै रहू जालेया जले बले रर ऐ्यर हो रही है।
ललक और वह होता है के जियो लो जिससे इच्छा पूरी हुई
डे के ऊले सादेय जो उधर के उज अल्प हो जाती ऐे
ज्जके के े उचचो जचर ज्ररा उथ सइल्नकस के भाज
ज्ल्हहोडे ररूहे है स्लन् के चङ उ्े ज शेके ल कि उकिक
उुडसड्चे जर लच्ति सेजड् जले ल । जेते धुआ जद् में सल
दुख हो जाता है जो ले जऊा घो श्र पल सहीे रखज ।
ज्हो जरणाों ते चचुय जाके सूरज लोर से आये सखर
क प हुए
हैं जो ज्जु जचज के अब खेल रहे है औ जसो ल्पोदि
ज्दहे हो रे है । जडे रह घलजचा जूर्र हु है ऊे एइदे
नुडूलो ऐ्े चल के कहते ब्या ह रल जख जो Fच
जात जल रो राज है ज्ल के घो उल्प रहे, जोके
उच्नाज्था ने नुझ़े ज्लो बात्ों को से ज्ञा रेजो थो जेसहो
के ऊनी ल रूल्ए-रनेकी रण रचह ररस है । =े
हु को च्ेचधल्प को रलूपर ेरूते के अरिऱ से रह
ज्चर कंरे के स्े्धत्ण को रूस घोड़े की अजिर री
है। यहपे के जसे के से ज्ड कुरे लललर जे लेऊल्से ऊो
जो चोदा जो यो र ऊर्े हुूरर से जाते आद उऊू सहों
नकाल जका था । जोऊ के रे ज्ले ज्प स्र उले से
=== अब छ र ४८ सोशर ३ मोर के
जल में सूझे ना क्या था वके ज्जे वहूर रे *रूरा शेे
उल्े चे बाहर बा । ले चोह उ३ है और ऐले

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