जिसमें रुचि(jsma Ruchi), part7

जिसमें रुचि(jsma Ruchi), 
Part7

सरकार पर दबाव डालने लगी । विशेष रूप से फ्रांस
इटली की ओर से दबाव दिया जाता था पर शहर कान्टः
लोग मेजिनी के पक्ष के थे, इस कारण बिना दोषी ठहराए उसे
पकड़ नहीं सकते थे। इसलिए उस पर यह दोष लगाया गया
कि वह फ्रांस तथा इटली के बादशाहों के मार डालने के यल
में है। फ्रांस और इटली के दूतों ने मिथ्या कलंक सच ठहराने
के अभिप्राय से एक मिथ्या कहानी भी गढ़ ली । पर इटली
से निकाले हुए लोगों ने इन गुप्तचरों को पकड़ कर उनके
पत्रों को छीन लिया और सारे भेद को प्रकट कर दिया । परन्त
स्विट्जरलैंड की मुख्य राज्यसभा में मेजिनी का जीवन पर्यन्त
देश से निकाल देने की आज्ञा दे दी । मेजिनी इससे तनिक भी
न घबड़ाया यद्यपि उसकी खोज में चारों ओर सरकारी भेदिए
घूम रहे थे, तिस पर भी वह स्विट्जरलैंड में ही रहा। वह
कदापि स्विट्जरलैंड से न जाता, यदि उसके दो परम मित्र उसे
इस बात का आग्रह न करते । उसने सं० १८३६ ई० में
इंगलैण्ड जाने का विचार किया । इस वर्ष के अन्तिम भाग में
उसका चित्त बड़ा व्याकुल रहता और उसे नित्य यही सोच बना
रहता कि जो काम वह कर रहा है वह सत्य नहीं है । उसे
अपने परिश्रम में सफल होने का संशय होने लगा
मेजिनी इस मानसिक व्याकुलता का वर्णन करता
है-'यदि मैं सौ वर्ष जीवित रहे तो भी इस समय को कदापि
विस्मरण नहीं कर सकता, और न उस व्यावहारिक व्यग्रता को
ही विचार सकता हूं जो मुझे भुगतनी पड़ी थी, और न उस
भ्रमण के भंवर को भूल सकता है जिससे मेरी आत्मा गिरत
गिरते बची। मैं बेचारा था कि मैं कदापि इस विषय का
जिह्वा पर न लाऊंगा, परन्तु जो मनुष्य मेरे पीछे आवेगे, आर
जिन्हें मेरे सरीखे देशोन्नति का उन्माद रहेगा, उसका मेरा यह
लेख अवश्य धीरज देगा तथा मेरा उदाहरण उनके उत्साह
बढायेगा, लाभदायक तथा रुचिकर होगा । इसलिए म ३९
व्यवस्था को अवश्य सविस्तार वर्णन करूंगा । मेरा
मानसिक व्यग्रता केवल सम्भावना तथा भ्रम पर निर्भर थी;
और मेरी राय में जो मनुष्य अपने जीवन को किसी महान् कार्य
के निमित्त समर्पण करते हैं, उन्हें यह मानसिक व्यग्रता अवश्य
ही भुगतनी पड़ती है। मेरा हृदय प्रेम से सदा परिपूर्ण रहा है
और सदा सुख की आशा करता आया हूं, यदि अपने लिए नहीं
तो किसी दूसरे ही के लिए, किसी न किसी प्रकार की आशा
करता रहा हूं 1 थोड़े दिनों से सांसारिक दु:ख अथवा काल
की गति से ऐसा दु:खित हुआ हूं कि वृद्ध अवस्था के समान
शिथिलता मुझ में आ गई है। जैसे किसी वृद्ध मनुष्य को
एक बड़े जंगल में अकेला छोड़ देने से उसे उसकी अयोग्यता
चारों ओर से एक भयंकर रूप देख पड़ती है, उसी प्रकार
मेरे नेत्रों के सामने भी वैसा ही समां बंध गया था । इसका
कारण यह नहीं था कि मेरी जातीय मनोकामनाओं की
सफलता थोडे काल स असम्भव दीख पड़ने लगी हो, या मेरी
पार्टी वाले छितर बितर हो गए हों, या अन्याय से बचने के
लिए मुझ को स्विट्जरलैंड से भी भागना पड़ा हो । केवल
यही कारण नहीं था कि जो कार्य मैंने स्विट्जरलैंड में प्रारम्भ
किया था, वह सब अकारथ गया और जो कुछ धन मेरे पास
था, वह सब उठ गया; वरंच मुख्य कारण यह था कि वह
प्रेम तथा परस्पर विश्वास जाता रहा जिसके सहारे मैं अब
तक अपने काम में दत्तचित्त लगा रहता था । मुझ को चारों
ओर भ्रम है भ्रम दीख पड़ने लगा । उन मित्रों में भी मुझे
विश्वास न रहा जिन्होंने मेरी शुभचिन्तना की शुद्धान्त:करण से
प्रतिज्ञा की थी, और यह प्रण किया था कि कठिन से कठिन
काम में वह मेरी सहायता करेंगे और मेरा साथ देंगे । मेरे
बाहरी भाव से मेरे परम मित्रों के हृदय में शंका उत्पन्न होने
लगी । तब भी मुझे इस बात के जानने की इच्छा न हुई कि
लोग मेरे विषय में क्या अनुमान करते हैं। यह देख कर कि वे
दो एक मनुष्य, जिनसे मैं विशेष प्रीति रखता था, मेरी प्रतिज्ञा
की पवित्रता में शंका करने लगे हैं, मुझे अत्यन्त दु:ख हुआ

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