जिसमें रुचि(jsma Ruchi), part6

जिसमें रुचि(jsma Ruchi), 
Part6
(=ब रहे कि व्यक्त केवल मात्र पढ़ लेते एे, सुत लेठे ऐे, जात लेते से
Ear नटी बन जाता। विद्वान रही है जो कि जाते छुए पो, सुते हुरेि
हो अपने आचरण में लाये। ऋषि ने लिखा है कि विद्या का फल है- आचरण
मैं आ जाना। पढ़ा हुआ, लिखा हुआ., जाना हुआ, समझा हुआ, यदि क्रिया रूप में
देगा तो फल है । पढा-=लिखा अगर क्रिया रूप में नहीं आता है तो सब गलत है।
आजकल देखने में आता है कि समाज के अन्दर पढ़ा-लिखा अधिकाश
कि जितना झूठा है, छल-कपट है, हिंसक है, द्रोही है, बुरा है, उतना अनपढ़

व्यक्ति नहीं है।

आत्मनिरीक्षण हर समय करें:-

आत्म-निरीक्षण का कार्य व्यक्ति दिन में कभी भी कर सकता है। अगर
दिन में कार्य करते समय व्यक्ति न कर पाये तो भी रात को सोते समय तो कर ही
सकता है। ये मेरी स्थिति है। इससे मध्यम स्थिति है,बीच-बीच में आत्म-निरीक्षण
करके अपने स्तर को देखना। आत्म-निरीक्षण की सूक्ष्म (गहरी) स्थिति है कि
व्यक्ति आधे-आधे घंटे में यह देखने का प्रयत्न करें कि क्या मेरा पतन हो रहा है या
उत्थान हो रहा है। अति सूक्ष्म रिथति यह होती है कि वह हर कार्य को करते हुये
ही नहीं बल्कि कार्य करने से पहले इस बात का परीक्षण कर ले कि इस कार्य को
करने से मेरे मन में, मेरी वाणी में और मेरे व्यवहार में किस प्रकार के क्रियाकलाप
होगे उसके परिणाम और प्रभाव क्या होंगे। इनको करके क्या मैं अशांत होऊगा,
अपमानित होऊगा या यह स्थिति दुःख को उत्पन्न करेगी। दुःख की स्थिति को
जानकर वह तत्काल उस स्थिति को रोक देता है। यही उच्च स्तर की स्थिति है।
आध्यात्मिक व्यक्ति, आत्मनिष्ठ व्यक्ति प्रत्येक क्षण आत्म निरीक्षण
के माध्यम से अपने उत्थान और पतन को देखता रहता है। वह हर समय
अपनी स्थिति का निरीक्षण करता रहता है कि मैं अभी दुखी हूँ कि सुखी हूँ मैं
अभी सत्य से युक्त हूँ या असत्य से, मैं न्याय से युक्त हैं या फिर अन्याय से
तुझमें सकता है या निष्कामता है, मन में विवेक ख्याति बनी हुई है या नहीं
ईश्वर–प्रणिधान की स्थिति बनी है या विषय-प्रणिधान है।
ने ज्ञान-विज्ञान प्राप्त किया है, ऐसा बुद्धिमान व्यक्ति ही इस बात का
पता तत्काल लगा पाता है । कोई-कोई ऐसा होता है कि वह काम के अंत में पता
लगा पाता है। कोई दिन में दो-चार बार पता लगा लेता है। कोई आधा- आधा
घण्टे में गलती जान लेता है। कुछ व्यक्ति ऐसे भी होते हैं कि जिनमें संस्कार अच्छे
होते हैं। एक व्यक्ति प्रत्येक मिनट में उदा प्रत्येक कार्य करने उ कालट ३ दि उती

लगा लेते हैं कि अभी मरी कौन सी स्थिति दी हुई है। अनर उनारी
स्थिति नहीं देनी है, दे हम उनकी प्राप्त करने का प्रयल करनता दाहित
श्राप आतमनिरीक्षण करके अ्प्ते अन्दर च्टरहे दिदारी की न्दिटि ता 2
तो पाया कि जैसे लकिक व्यक्ति दिदार करता है. दैसी विचार न २३,
आते रहते हैं। एक लौकिक व्यक्त जैसा बोलता है, व्यवहार ठरता है
आपके मन का और दही का प्रयोग होता है जिस तरह का यह हार -
वैसे ही आप नी व्यवहार करते हिके। आपक वेदहर दीदार और दो !
लौकिक व्यक्तियों की तरह होते हैं. कई अन्तर नहीं होता है च्न्नें उनार उद
गमीरता रहती है न शिष्टता रहती है न शंट रही है और अट ।
है। लौकिक व्यक्तियों की तच ही मा बिष्ट यी ट टा
बनाता पता हठे।
ऐश्वर्य तो यह होता है कि उस स्थिति का हम उस सन्य हें पकड़
कोई बात नहीं। कई बार तो उस क्रिया के घट जाने के बाद भी कर
दो-चार घंटे के बाद भी नहीं समझ पाते। रात्रि को होने से पहले है ।
जो विशेष घटनाएं घटी हैं, उनके विचारों को ठीक प्रकार से पकड़ नहीं पाते 1
व्यक्ति कदापि उन्नति नहीं कर सकते। दे आध्यात्मिक व्यक्ति में नई ।
धार्मिक है, न आध्यात्मिक हैं। अपनी किसी त्रुटि को, दोपहर को न हो ।
अधर्म को, अनिष्ट कर्म को, तर्क के पटपात को और यन–नियन ३ ।
आचरण को दिन में पकड़ नहीं पा रहा है। दिन में जो किया है, दह उसे त्र-1
नहीं पकड़ पा रहा है और अगर पकड़ लेता है तो भी उसक निकारक
रहा है। अगर हानिकारक मान लेता है तो भी उसको रोकने के लिए मन ==
नहीं ले रहा है। कमी संकल्प ले नी लेता है, तो उसके नष्ट करने के =ि =
को नहीं जा रहा है। उनसे सतक, सावधान नहीं रह रहा है। उन्हें हटन
ईश्वर से सहायता नहीं माँग रहा है। ऐसा व्यक्ति फिर दुदारा दी ऋटि कत
और बार-बार त्रुटि करता ही रहता है।
आप अनुभव करेंगे कि व्यक्ति ने अपने घर को छोड़कर अग्रन में ।
अपनी लौकिक प्रवृत्तियों की, लौकिक वातावरण को छोड़ दिया है। इनमें
जीवन, उच्च विचार, सात्विक वातावरण, यज्ञ, संध्या, उपासना और
आदि सब कुछ अलौकिक स्थितिया है। ये संसार से, सामरिक प्रददि हैं।
हैं। ऐसा होने पर भी वो पुरानी त्रुटियाँ अनेक बार होती हुई दिखई देती हैं।

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