जिसमें रुचि(jsma Ruchi), part5

जिसमें रुचि(jsma Ruchi), 
Part5
जानवर नहीं है, नि ता नही है तो समझो कुछ भी नहीं है।
आत्मनिरीक्षण के माध्यम से हम अपने जीवन को निर्मल, पवित्र और
न से रहित बना सकते हैं। आत्म-निरीक्षण करने से पता चलता है कि हमने
5 ऐसी बाते जो वास्तव में हानिकारक हैं, पकड़ रखी है और जो लाभकारी दाते
से छेड़ रखा है। आत्म-निरीक्षण किये बिना व्यक्ति को इन
ही चलता है ।अपने जीवन का आदर्श मार्ग पर ठीक प्रकाप पे चलाठे के
तय की प्राप्ति के लिए और जीवन का अत्यंत प्रसन्न, सुखी,
तक और स्वतंत्र बनाने के लिए आत्म-निरीक्षण के माध्यम से
जे देशों को जानें।

दो प्रकार का जीवन बना हुआ है- बाहरी अलग और आतंकि अलग हो
ना है कि अनेक बार आप बातों को छुपाते होंगे, अतिशयोक्तिपूर्ण दोलते हंगे
जे छत बताने योग्य है उसको टालते होंगे, बताने योग्य को नहीं बताते हैं. कम
ने वालों को अधिक बताते हैं। आत्म निरीक्षण से यह पता चलेगा। अत्यंत
वित छोटे बच्चे की तरह हमारा जीवन होना चाहिए। ऐसे जीवन को
ने वाला व्यक्ति ही अपने जीवन को हलका=-फुलका लेकर के चलता है
चदा घर छोड़ दिया, मा-बाप छोड़ दिये, धन-संपत्ति छोड़ दी, सब कुछ छड़
' और फिर भी संसार की प्रवृत्तियाँ जिससे- राग की, ईर्ष्या की, अहकार की मन
बनी रहीं तो लौकिक और आध्यात्मिक व्यक्ति में क्या अतर रहा ?

यात मंदिर जाये या न जाये ईश्वर की उपासना करे या न करे बैठकर के
११ या न करे, भक्ति के गीत गाये या ना गाये लेकिन जो व्यक्ति पूर्ण तन्मयता
से जर सच्चे हृदय से बैठकर के आँखे बंद करके अपने जीवन को ठीक प्रकार
देखता है तो उसको अपनी त्रुटि दिखाई देती है। वह उनको हानिकारक मानत है
उनको नष्ट करने के लिए प्रयास करता है तो निश्चित रूप से ऐसा व्यक्ति
|त्र बन जाता है।
हम कहा पर अटक जाते हैं, यह भी सुन लीजिए आप। पछले · तो हम
सदी उल्टियों के, दोषों को जानने का प्रयास नही कहते है। अगार
पट होती है, तो उसको देखकर भूल जाते है। शूलते बाही है तो उतळो
सानते है, तो उसको हटाने
तही जुटाते छै, सतर्क सावधान नही रते छै। उसपे पिए रात्तँ *
असफलता मिलती है।
पुराने बुरे संस्कार जलते हैं, वे नये अच्छे संकल्पों को दवा देते हैं। इसत ।
कारण जब दुबारा उलटे काम कर देते हैं तो फिर विचारते हैं कि सीधा
लिए असंभव है, चलो इसको छोड़ो। इस तरह वे अच्छे सीधे काम को छोडळ
उलटे काम को फिर करने लग जाते है। इस प्रकार व्यक्ति अच्छे काम को 5
छोड़ देता है। यह सारी हमारी नास्तिकता की स्थिति है।
आत्म-निरीक्षण करके देखेंगे तो पता चलेगा कि कोई व्यक्ति आधा -
आस्तिक रहता है बस, शेष समय में नास्तिक बना रहता है, और कोई अधि
प्रयास करने वाला हुआ तो वह एक घंटा और कोई पुरुषार्थ करने वाला दो घट
ढाई घंटे, तीन घंटे या चार घंटे तक आस्तिक बना रहता है। आस्तिकता के
मतलब क्या है? आस्तिकता का मतलब है- दिल-दिमाग के अदर, मन-मस्तिर
के अंदर, ईश्वर की सत्ता की अनुभूति शब्द प्रमाण से और अनुमान प्रमाण ।
बनाये रखना, ईश्वर मुझे हर समय देख रहा है, यह अनुभव करना।

मात्र यह जानना पर्याप्त नहीं है कि यह काम गलत है, यह काम अच्छा है यह
धर्म है, यह अधर्म है, यह पाप है, यह पुण्य है। इतना जानकर के यह भी संकट
होना चाहिए कि मुझे यह अच्छा धार्मिक काम करना है। जो ऐसा करने लिए पू
प्रयास करता है, तपस्या करता है, त्याग करता है, पुरुषार्थ करता है, वह व्यक्ति हैं
पूर्ण रूप से आस्तिक है अर्थात् ईश्वर को मानने वाला है। इसके विपरीत, जान ।
को तो खूब जान लेता है कि ये खराब है, ये अच्छा है, ये धर्म है, ये अधर्म है, ये पाः।
है, ये पुण्य है, ये न्याय है, ये अन्याय है, ये उचित है, ये अनुचित है, ये कर्तव्य है ।
अकर्तव्य है, लेकिन फिर भी करता कुछ नहीं, वैसा का वैसा पडा रहता है। यह
शाब्दिक-ज्ञान कहलाता है। अशाब्दिक-ज्ञान के ऊपर व्यक्ति विचार–चिन्तन करे
अच्छे को करे, बुरे को छोड़े और छोड़े रखे तथा अच्छे को ग्रहण कर रखे तब
जाकर के व्यक्ति को इस मार्ग में सफलता मिलती है। प्रायः व्यक्ति जानकर है।
अटक जाता है कि यह अच्छा है, यह बुरा है, मगर अच्छे को ग्रहण करने का और
वरे को छोड़ने का मन में कोई संकल्प नहीं होता और ऐसे व्यक्ति को लोग बिडवन
कह देते हैं। वास्तव में पूर्ण विद्वान् तो वह होता है, जो शब्दार्थ (शब्द और उसके।
अर्थ के) सम्बन्ध को जानता है और जाकर के उसके विषय में निश्चय करता है
निश्चय करके बुरे को छोड़ने और अच्छे को ्रहण करने के लिए प्रयास करती
समस्या-समाधान
तपस्या करता है और बुरे को छोड़ देता है और अच्छे को जीवन में उतार लेता

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