जिसमें रुचि(jsma Ruchi), part4

जिसमें रुचि(jsma Ruchi), 
Part4
: गंभीरता और समस्याओं का समाधान केवल मात्र ईश्वर की सहायता से
कुछ
(इ होरा है। आप चाहे सारे शास्त्रों को क्यों न पढ़ लें, चारों वेदो को रट ले तो
नहीं होगा। व्यावहारिक रूप में ईश्वर के प्रति अनुपान प्रमाण से शष्द
नल से ठीक प्रकार से जान लेना जरूरी है। मस्तिष्क में यह विठा लेता
आरी है कि ईश्वर है, औफ़ मुझे छ८ पल देख पठा है, सुन रफा है औ
त रहा है। उसके बिना मैं कोई कार्य करने में समर्थ नहीं हो सकता। ऐसा
जियार करके चलने वाला व्यक्ति ही इन संसार के जंजालों से बच सकता है। तब
सखी रह सकता है और अपने जीवन को ईश्वर के सानिध्य में रख
के निर्देश के अनुसार, सारे जीवन को चलाता हुआ अपने जीवन को पवित्र
सकता है। ऐसा व्यक्ति ही अपने जीवन के उद्देश्य (मोक्ष) को प्राप्त कर
ता है। शेष व्यक्तियों के लिए जन्म-जन्मांतर तक, फिर मरना फिर जीना ये

स्थिति बनती है।

हमें सिद्धांत रूप से यह समझने का प्रयास करना चाहिए कि जैसे हम धन
को कमाते हैं और कमाये धन का निरीक्षण–परीक्षण करते हैं। कितना घन हो गया
है मेरे पास में, लौकिक आदमी इसका हिसाब लगाता है। आज से 10 वर्ष पहले
से मर पास में यह जमीन, सोना, चाँदी और मकान मिलाकर के 15 लाख के थे,
आज ये 50 लाख के हो गये हैं, ऐसा विचार करता है। फिर जैसे-जैसे धन बढ़ता

हैं वह आगे विचार करता जाता है कि अब मेरे 80 लाख के हो गये है, अब
| करोड़ के हो गये हैं। ऐसे ही आध्यात्मिक व्यक्ति भी आत्म-निरीक्षण्ण कर
URL मे हिसाब करता है कि पहले मै कितना दुःखी होता था,
फिले तोरा धैर्य कितना था, पहले मेरी सषन-शक्ति कितनी थी, पहले मै

दी कितना था, पिछले मै पोपकारी कितना था, पिछले मै शात-सुखरी
और एकता d
cण कितना था, पहले मै निरीक कितना था और आज कितना
t तारा
Ku आत्मनिरीक्षण के दौरान इन आध्यात्मिक संपत्ति का स
|भक्ति विचार करता है।
व्यक्ति की निर्भीकता, प्रसन्नता, शांति, निष्कामता. एकाग्रता, बुद्धिमता
शांति हो रही है। इसके विपरीत वह दर्शन भी पढ़ रहा है, केद भी पढ़ रहा है,
दे-अदि जो गण बताये गये हैं, वे बढ़ रहे हैं तो समझना चाहिए कि व्यक्ति की
दते-पदते 2 वर्ष हो गये हैं, 4 वर्ष हो गये हैं, 6 वर्ष हो गये हैं, व्याकरण भी पढ़
ी तिर ली. सब कुछ कर लिया उसने
लेकिन उनके जीवन के अंदर, जो सच्चाई है, निष्कामता है, सहन-शखि्ति ४
है, गंभीरता की स्थिति है, वह वैसी की वैसी बनी हुई है बल्कि पहले की रुल्त (
गिर गई है तो समझना चाहिए। कि अब तक का किया धरा सब कुछ वेकर३
हमने जीवन में ऐसे-ऐसे विद्वानों को देखा है जो दर्शनों के, उपनिषदा ३
संस्कृत
भाषा के प्रकांड विद्वान है, लेकिन उनके जीवन के अंदर महान द्रख३
हुआ है ।ईर्ष्या से भरे हुये, कंजूसी से भरे हुये, स्वार्थ से भरे हुये, राग औज
राग और मम
से भरे हुये, ऐसे व्यक्तियों के खोखले जीवन को मैंने देखा है। ऐसा जीत
नहीं चाहिए। मैं तो उस व्यक्ति को अच्छा मानता हूँ जिसे शायद बोलना न
है, दो अक्षर नहीं आते हैं, लेकिन मार्ग में चला हुआ है।
प्रायः यह भी देखने में आया है कि ज्यों-ज्यों व्यक्ति शास्त्रों को
है, दर्शनों को पढ़ता है, संस्कृत भाषा आती है, त्यो-त्यो, लुकाव-रु
छल-कपट, निंदा-चुगली, जीवन में बढ़ते जाते हैं। बहुत कम ऐसे व्यक्ति है
हैं जो राग, द्वेष, निंदा और चुगली से मुक्त होते हैं। अधिकांश के जीवन ।
बोलने पर परिग्रह (अनावश्यक बोलना), करने पर अपरिग्रह पर विचार
परिग्रह, लिखने में परिग्रह और क्रिया-कलापों में परिग्रह भरा पड़ा है। ये व
की बातें लोगों के पकड़ में नहीं आती है।

सूक्ष्मता से आत्म-निरीक्षण करने वाले व्यक्ति को बहुत कुछ बताने
जरूरत नहीं है, कोई विशेष निर्देश देने की जरूरत नहीं है। वह भूल को
ही नहीं। वह पूरी शक्ति, बल, सामर्थ्य से काम करेगा। उससे न त्रुटि हो

भूल होगी। वह व्यवहार से गलत करेगा नहीं और वाणी से गलत बोल
नहीं, मन से भी गलत विचार नहीं करेगा, क्यों? उसे यह पता है कि मन *
गलत चिंतन करने पर उसकी उपासना नष्ट हो जाती है, उसकी शांति न
हो जाती है, उसकी पवित्रता, उसका हलकापन, उसकी निर्मलता नष्ट हो जाते
है। वह ऐसे जीवन को नहीं चाहता है। आध्यात्मिक आदमी तो ऐसे हलके-फुल
जीवन को चाहता है, जैसे आकाश में उड़ रहा है। इतनी निष्कामता उस
जीवन में रहती है। इसके विपरीत जो व्यक्ति झूठ भी बोल रहा है, निंदा *
कर रहा है, आलसी बना हुआ है, खाने-पीने में, उठने में बैठने में लेन-द।
में संयम नहीं है और यम-नियम का सूक्ष्मता से पालन नहीं कर रहा
सकामता (स्वार्थता) बनी हुई है तो ऐसा व्यक्ति आध्यात्मिक क्षेत्र में चल

समस्या समाधान
व। लौकिक या आध्यात्मिक व्यक्ति में यदि कार्य करते

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