जिसमें रुचि(jsma Ruchi), part3

जिसमें रुचि(jsma Ruchi), 
Part3
ऐसा बिल्कुल हो सकता है, ऐसी आदर्श स्थिति बना सकता है व्यक्ति ं
प्रयोग करके तो देखिये आप । किसी का मन अत्यंत चंचल है। दिन में उत्त
प्रतिकूल वितर्क उत्पन्न होते हैं, लौकिकता सांसारिकता बनी रहती है ।
तमोगुण बना रहता है स्वार्थ की प्रवृत्ति बनी रहती है। वह व्यक्ति चार-चार।
प्रयोग कर सकता है। दो-दो घंटे में कर सकता है। एक घंटे बैठकर के
(प्रयास) कर सकता है कि नहीं, आनंद आता है मुझे। मगर इसके लिए लौकिे
छोडनी पडती है। स्वार्थ, आलस्य, प्रमाद आदि इन क्रियाकलापों को छोड़ना ।
है, तब जाके बात बनती है।
अन्तर्वत्ति बनकर के, सतर्क व सावधान होकर के संकल्प के
आदर्शों को साथ लेकर पूर्ण पुरुषार्थ और तपस्या के साथ में जो ।
चलता है, वह इस स्थिति को प्राप्त कर सकता है। एक दिन में प्राप्त
सकता है। आगे सतत चलते-चलते इसके संस्कार बन जाते है। आपस में एक
के विशेष गुणों को देखकर के हम अपने अवगुणों का पता लगा सकते हैं।

हर एक व्यक्ति के अलग-अलग गुण हैं। अगर हमारे में उन गुणों का अभ
है तो हम प्रयास कर उन गुणों को अपने अंदर ला सकते है और सफल व सुखी
सकते हैं।

(26) कोई जान अपनी गाय को आभूषण समझकर न मुकुयेवा,
कोई इंसान ी के लिए अपने को कुत्ता नहीं बनेगा। कारण कि
दासता में सुख मिलता नहीं। इस विषय में आचार्य-वचन है

हम दूसरे को रोबोट की तरह
अपनी मनमर्जी से नहीं चला सकते l

प्रत्येक व्यक्ति हमारे विषय में सोचने में, बोलने में, और करने में स्वतंत्र है
यह वाक्य एक महामंत्र है, जो हमने अपने गुरु से सीखा है। जैसा व्यक्ति का
ज्ञान-विज्ञान है, जैसा उसका परीक्षण है, जैसी उसकी मानसिक स्थिति है, जै
उसका सिद्धांत है, जैसी उसकी मान्यता है, उसके अनुसार ही वह हमारे विषय
विचार करेगा। हम दूसरे व्यक्ति को रिमोट कंट्रोल की तरह अपने अनुकूलन
नहीं
चला सकते। हम ऐसा आग्रह नहीं कर सकते कि वह मेरे विषय में ऐसा कहे-बोले,
ऐसा सोचे विचारे, ऐसा माने, ऐसा करे। यह कभी नहीं हो सकता।

समस्या=समाधान
कष्टों को विरोधियों की जाति बालों की, सम्बन्धियों की पड़सियों
की मित्रों की बात छोड़ दीजिये। घर के अंदर पति-पली है
भाई-भाई हो, उनके आचरण को देखकर। शायद ही कोई ऐसा परिवारका
निदे तो कितना ही घनिप्ठ क्यों न हो, परन्तु दूसरे के विषय में क
निकल न विचारता हो, कभी परस्पर विरोध उत्पन्न न करता हो, दसरे के
संशय न करता हो, अनिष्ट चिंतन न करता हो। मिलना बहुत कठिन है। चाहे वह
पति-पत्नी, बाप-बेटा, भाई-बहिन दस वर्ष से. बीस वर्ष से, या फिर पचास वर्ष से
साथ में रह रहे हों लेकिन फिर भी उनके बीच में कहीं न कहीं, किसी न किसी
विषय के अंदर विरोध उत्पन्न होता ही है। एक दूसरे के प्रति गलत विचार करते
हैं। इस बात को वाणी से स्वीकार करना एक अलग वात है, जबकि मन से स्वीकार
करना और बात है।
हम घरों में देखेंगे, परिवारों में देखेगे, संस्थाओं में देखेंगे। वहां पर गुरु हैं,
आचार्य है, माता-पिता है, पति-पत्नी हैं, शत-प्रतिशत विचार किसी के नहीं
मिलते हैं। ऐसे धार्मिक वर्तमान में बहुत कम मिलेंगे, हजारों में नहीं, लाखों में कोई
एक दो पति-पत्नी, बाप-बेटा, भाई-बहन मिल जाये तो मैं इसे वड़ा गर्व का विषय
समझेंगा। कितने ही अच्छे पति-पली हो, बाप-बेटे हों किसी ना किसी विषय के
अंदर मन के अंदर विरोध बना होगा। ये अलग बात है कि- संशय के कारण,
लज्जा के कारण या पारिवारिक स्थितियों को बनाने के कारण, या किसी अन्य
कारण से व्यक्ति उसको सहन कर लेता है, बोलता नहीं है, समर्पण करता है,
उसके साथ चलता रहता है, लेकिन मन से भी समर्थन हो ऐसा आवश्यक नहीं है।

एक सिद्धांत है. इसकी मन में कल्पना करनी चाहिये। जैसे मैं विद्यालय में
पढ़ाता हूँ, विद्यार्थियों की व्यवस्था करता हूँ। मैं विद्यार्थियों के कल्याण के लिए,
हित के लिए काम करता हूँ। इतना करते हुए भी मैं मन में यह विचार नहीं करता
कि प्रत्येक विद्यार्थी, मेरी प्रत्येक क्रिया के, प्रत्येक वाणी को, प्रत्येक विचार को
ठीक प्रकार से समझेगा और उसका समर्थन करेगा। कुछ बातें इनहीं विषयों में
कभी न कभी किनहीं अंशों में समझ में नहीं आती और मन में पड़ी रहती है। इसी
प्रकार हम ऐसा विचार कभी नहीं करते हैं कि हमारी बात पूरी की ूरी आपको
समझ में आती हो। इसलिए हमारे विचारों को, चेष्टाओं को, क्रियाओं

योजनाओं को, कार्य करने की शैली को, सिद्धांतों को, मंतव्य को, लो

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