जिसमें रुचि(jsma Ruchi), part 15

जिसमें रुचि(jsma Ruchi),
 part 15
गुरुकुल डीजे का शतवर्षीय इतिहास
करने का एक मात्र साधन था । इसलिए गुरुकुल को आन्तरिक व्यवस्था तथा अध्यापन आदि को मा० धर्मसिंह
जी तथा पं० विश्वप्रिय जी के सुपुर्द करके आचार्य जी ने जनता में प्रचार कार्य करने की योजना बनाया। इस
विषय में उचित निदेश लेने के लिए भगवान्देव जी रावलपणड़ी गरुवल के आचार्य स्वामी आत्मानन्द जी के
दर्शनार्थ चल पड़े। स्वामी आत्मानन्द जी उन दिनों आर्य समाज के शिरोमणि संन्यासियों में थे। स्वामी जी न
केवल विद्वत् में ही प्रतिष्ठा को प्राप्त थे अपितु योगाभ्यास में भी विसात थे। इसके साथ ही नि:श्ुल्क
चिकित्सा आदि सामाजिक कार्यों के द्वारा स्वामी जी जन-साधारण में भी इतनी लोकप्रियता प्राप्त कर चुके थे
कि मुसलमान भाई स्वामी जी को 'पोर ' कह कर उनके प्रति अपनी अदा व्यक्त करते थे। यह स्वामी
आत्मानन्द का ही प्रभाव था कि मुसलमानों के बच्चे भी गरुकल पोठोहार में पढ़ते थे। सर्वसाधारण का इतना
प्रेम एवं शिक्षा प्राप्त करने के पछी स्वामी आत्मानन्द की तपस्या थी कि यदि अउ रात्रि में भी उनकी का
चिकित्सा के लिए बुलाने आ गया तो स्वामी जी बिना कोई कछ अनुभव किये उसी समय तुरन्त उसके साथ
बल देते थे। ऐसे नि:स्पृहसने सन्त सेवकों के कारण ही तो आर्यसमाज का प्रचार हो पाया है। पं० लेखराम,
महात्मा मुंशीराम, मुनि गुरुदत्त स्वामी दर्शनानन्द, स्वामी स्वतन्त्रानन्द, स्वामी वेदानन्द तीर्थ आदि एक नहीं,
अनेक महापुरुषों को पंक्ति है उन्होंने आर्य समाज के लिए अपने जीवन को अर्पित किया है। स्वामी आत्मानन्द
जी के विद्यार्थी काल की एक घटना है यह बतलाने के लिए पर्याप्त है कि छात्रावस्था में भी उनका अपन मन
पर कितना नियन्त्रण था। स्वामी जी संन्यास ग्रहण करने से पूर्व जब विद्याध्ययन कर रहे थे तब उनके पास घर
से मित्रों के तथा संबंधियों के अनेक पत्र आते रहते थे किन्त वे उनकी पढे बिना ही अपने बिस्तर के नीचे
दबाते चले गये। अध्ययन पूर्ण होने पर सभी को एक साथ निकाल कर देखा तो किसी में मृत्यु का समाचार,
किसी में जन्म का तो किसी में अन्य सांसारिक चर्चाएं थी। उस समय तो सब घटनाएं अतीत की हो चुकी थी।
अब उनको पढ़ने का लाभ ह क्या था ? विद्या समाप्ति पर पं० मुक्तिराम के रूप में पहले तो आपने गुरुकुल
चूहा भक्तों में गुरुकुल चलाया उसके बाद रावलपिंडी से १३ किलोमीटर दूर पोठोहार गुरुकुल का संचालन
उस समय आप कर रहे थे, जव आचार्य भगवान्देव जी उनके पास गये।

ब्रह्मचारी भगवानदेव के वहां जाने के कई कारण थे। यथा स्वामी जी से सामाजिक क्षेत्र में आर्यसमाज
के प्रचार हेतु दिशा निर्देश प्राप्त करना, गुरुकुल संचालन विषयक स्वामी जी के अनुभव प्राप्त करना तथा साथ
ही योगाभ्यास को शिक्षा प्राप्त करना । ब्रह्मचारी जी भी उन दिनों प्राणायाम का अभ्यास किया करते थे। अत:
उन्होंने इस विषय में स्वामी आत्मानन्द जी से उचित निर्देश प्राप्त किया। इसी प्रकार अन्य विषयों पर परामर्श
करने के साथ ब्रह्मचारी जी ने वहां तक्षशिला विश्वविद्यालय के पुराने अवशेष भी देखे जो रावल पिण्डी से २४
किलो मीटर दूर थे।
प्रचार विषयक परामर्श देते हुए स्वामी आत्मानन्द जी ब्रह्मचारी जी से बोले कि हरयाणा प्रांत में स्थान
स्थान पर ऐसे उपदेशक शिक्षा केन्द्र स्थापित कीजिए जहां से शिक्षित होकर युवक ग्रामों में जाकर प्रचार कर
सकें। अब तक आर्य समाज के भजनोपदेशक अपने भजनों के द्वारा जनता में जागृति करते रहे हैं इसी का

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