जिसमें रुचि(jsma Ruchi), part 14

जिसमें रुचि(jsma Ruchi),
 part 14
गुरुकुल का राषulहा।।

गठ का स्थापना-इस प्रकार गुरुकुल के आंतरिक तथा सुधरती ॥ रही थी। पठन पाठन भी

सुचारू रूप से चलने लगा था। पं० विश्व कप व्याकरण के मर्मझ विदान थे। ये । लगन एवं परिश्रम से
अपने छात्रों को भी वैसा ही विद्वान् बनाने का गज कर रहे थे। इसी बीच गुरुकुल गौतमनगर (दिल्ली) के
आचार्य राजेन्द्रनाथ जी शास्त्रों में मानन्द तिवारा विद्यापीठ निण का विचार किया। इससे पूछ।
गुरुकुल अपने अपने तरीके से अध्ययन-अध्यापन कराते हुए चल रहे थे। इस ािपीठ की स्थापना का
उदेश्य घा कि सभी गुरुकुल के पाठ्यक्रम आदि में एकरूपता आ जाए जिससे कि विध्ययन सुचारु एवं
स्थायी रूप से चल सके। इस विद्यापीठ के अंतर्गत गुरुकुल गौतम मगर दिली, गुरुकुल इजर था गुरुकुल
बुकलाना (मेरठ) को लिया गया। विद्यापीठ की अपनी पाठविधिता परीक्षाएं निर्थारित की गयी जो इसके
अन्तर्गत आने वाले सभी गुरुकुल को मान्य थी। विद्यापीठ की उपाधियां तथा पाठ्पक्रम निस् प्रकार से थे-
१. व्याकरणोपाध्यायः-इसमें अष्टाध्यायी की प्रथमावृत्ति का अध्यापन कराया जाता था।
२. सिद्धिवारिधि-इस कक्षा में केवल व्याकरणानुसार शब्दों की सिद्धियां की जाती थी। सुबन्त, ति,
कृदन्त, तद्धितान्त आदि सभी प्रकार के रूपों की सिद्धि में दक्षता प्राप्त करना इस कक्षा का उद्देश्य ।।
व्याकरण शास्त्री इसमें कोशिका तथा परिभाषा पाठ आदि पढ़ाए जाते थे। इसका उद्देश्य काशिका में
प्रदर्शित शंका समाधान आदि में दक्षता प्राप्त करते हुए द्वितीयात के रूप में व्याकरण का अ१ययन

करना था।
४. भाष्य आचार्य-इस कक्षा में सम्पूर्ण महाभाष्य पहनकर यह उपाधि प्रदान की जाती थी।

इससे पूर्व गुरुकुल में काशिका भी नहीं पायी जाती थी क्योंकि वह भी उपिप्रणीत नहीं है।
उक्त विद्यापीठ बनने के पीछे भी एक कारण यह रहा है कि पं० पदत्त जी जिज्ञासु तथा आचार्य
राजेन्द्रनाथ जी दोनों ही अविभाजित भारत के लाहौर में आर प्रणाली के अनुसार अध्यापन कराते थे। लाहौर
उन दिनों उसी प्रकार विद्या का केन्द्र था जैसे बौद्धकाल में कभी नालन्दा तथा तक्षाशिला इस विषय में
सुविख्यात थे। धपि आचार्य राजेन्द्रनाथ जी तथा पण्डित ग्रह्मदत जिलासु जी दोनों का ही रेश्य आप
पाठविधि का प्रचार करना था किनाु अध्यापन विधि को लेकर दोनों में मतभेद हो गया। पण्डित जिज्ञास जी का
मानना था कि पहले अष्टाध्यायी कंठस्थ कर देनी चाहिए। तदनन्तर तसे अर्थ सहित पढ़ाना चाहिए। शर्म
राजेन्द्रनाथ जी का मानना था कि सूत्र मरण तथा उनका अर्थ एक ही समय में सासा कर लेने चाहिए।
देसी बात पर दोनों में मतभेद हो गगी भी। दोनो विदानों ने अपनी शैलियों को चरितार् करने के लिए पूछ ।
पधक शिक्षणालय स्थापित किये जिज्ञास जी ने मोतीलाल वाराणसी में' पाणिनीय महाविद्यालगता आया।
राजेन्द्रनाथ जो मे दिली में श्रीम दयानन्द वेद विद्यालय गुरुकुल गौतम नगर' ।।

आचार्य भगवान देव का मुख्य उद्देश्य गुरुकुल या अन्य किसी संस्था की धालन मापनमा अथिए
तो अपने जैसे त्यागी तपस्वी, समाजसेवक भी उत्पन्न करना चाहते थे। गुरुकुल भी ऐसे मेतको को ।

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