जिसमें रुचि(jsma Ruchi), part 13

जिसमें रुचि(jsma Ruchi),
 part 13
गुरुकुल नगर का सत्य इतिहास
आर्यकुमार सभा–गुरुकुल में छात्रों को केवल पुस्तकों के ज्ञान तक ही सीमित नहीं रखा जाता है अपितु
शिक्षा के साथ-साथ उनके अन्य प्रकार की उन्नति पर भी ध्यान रखा जाता है। यथा छात्रों में व्याख्यान आदि
की प्रवृत्ति उत्पन्न करने के लिए वावडिंनी सभा तथा इसी प्रकार उनमें निर्वाचन आदि अन्य गतिविधियों को
उत्पन्न करने के लिए आर्यकुमार सभा भी स्थापित है। इसी उद्देश्य से आचार्य भगवान्देव जी के द्वारा दीपावली
सं० २००६ तदनुसार १९ अक्टूबर १९४९ को गुरुकुल में आर्य कुमार सभा की स्थापना की गयी। इन सभाओं
की नियमित बैठक होती रहती हैं जिनमें छात्र तथा अध्यापक उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं। इन सभाओं में भाग
लेने का ही परिणाम है कि विद्यार्थियों को संस्कृत एवं आर्यभाषा में धाराप्रवाह व्याख्यान देने का अच्ा
अभ्यास हो जाता है। अपनी श्रेष्ठ वक्तृता के आधार पर गुरुकुल के अनेक छात्रों ने गुरुकुल में रहते हुए बाहर
होने वाली भाषण प्रतियोगिताओं में भाग लेकर तथा गुरुकुल छोड़ने पर अन्यत्र भी अनेक पुरस्कार प्राप्त किये

हैं।

आर्यकुमार पुस्तकालय-इस आर्यकुमार सभा का एक पुस्तकालय भी था। इसे गुरुकुल के आर्यकुमार
चलाते थे। इसमें लगभग २००० पुस्तकें थी। इस पुस्तकालय से छोटी श्रेणी के विद्यार्थी पुस्तक लेकर
स्वाध्याय द्वारा लाभ उठाया करते थे। १९६२ ई० में इस पुस्तकालय की कुछ पुस्तकें ब्रह्मचारियों को बेच दो
गई तथा कुछ पुस्तकें छात्रों को पुरस्कार में दे दी गई।
गुरुकुल झज्जर के अतिरिक्त देश में अन्यत्र भी आर्यसमाजों में आर्यकमार सभाएं स्थापित हैं। इनमें से
अनेक सभाये तो प्रशंसनीय कार्य कर रही है। आर्य कुमार सभा आर्यसमाज के प्रचार का सशक्त साधन थी।
कालक्रम से तरुणाई एवं जीर्णता को प्राप्त होने वाले लोगों का स्थान लेने के लिए ये सभायें आर्यसमाज की
आशाओं का केन्द्र थी। बच्चों एवं कुमारी को आर्य समाज में लाकर आर्यसमाज के यौवन को अक्षण्ण रखने
का साधन थी। आर्य समाज की ज्वाला को हाथ में लेकर आगे बढने का साधन थी किन्तु खेद हैं कि हमने इस
और अपना ध्यान नहीं दिया, जिसका परिणाम भी सामने है। आज आर्यसमाजों के सासाहिक सत्संगों तथा
अन्य अधिवेशनों में प्रायः बड़ी आयु के व्यक्ति ही नजर आते हैं। बच्चे किशोर कुमार यहां से दूर होते जा रहे
हैं। यदि यही अवस्था रही तो आर्यसमाजियों का सतत प्रवाह उच्छिा हो जायेगा। यदि पीछे से पानी नहीं
आयेगा तो नदी आगे कैसे बढ़ेगी? वह सुख आयेगी। आर्य समाज में भी ऐसा होने लगा है। ऐसे अनेक
उदाहरण हैं जिनके पूर्वज आर्य समाजी थे किन्तु उनकी दूसरी-तीसरी पीढ़ी में ही उनकी सन्तान का सम्बन्ध
आर्यसमाज से उच्छिन हो गया। यह तभी हुआ जबकि हमने कुमारी के रूप में इस अति महत्वपूर्ण पौध को
संभालने का यल नहीं किया तथा अपनी पद-प्रतिष्ठ आदि अन्य विवादों में लगे रहे। गुरुकुलों के साथ-साथ
गीता में आर्य मार सभाओं को सशक्त करने की आज महती आवश्यकता है। हमें राष्ट्रीय स्वयं सेवक ।
जैसे संगठनों से शिक्षा लेनी चाहिए।

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