जिसमें रुचि(jsma Ruchi), Part 11

जिसमें रुचि(jsma Ruchi), 
Part 11
जर को शाम

अगर शरीर भीर र राहे से कम समय गुरुकुल के
या बादल दी कल पर जाने लगा। पर गुस्
का परी कारण से गुल होकर गए थे।
मचर चरिश्रम करके कुतकरूप मार दिया था। उनके अकर्मात् चले जाने से
४ ६ थे। १२मिति के पानी लागी लगन काय की प्रष्टि से गाना
का ॥ अSIT पद के लिए पत्र किया जिसे अपने सहर्ष स्वीकार कर लिया।
के मान ५ वराम जी को भी बना दिया गया क्योंकि लोग मन्त्री होते हुए भी ये
कसे पत रहे थे। लक्ष्मण दास जी के प्रस्ताव पर ही घराणी निथारो लाकर हालसिंह को
आपण शिक्षण का कार्य प दी गयी चरा आवश्यक कार्य पी। आगामी वर् के लिए,
f १३ किया गया जिसमें प्रधान पद पर समादाम जी, उपप्रधानों में मतदान
| उपली चरण कमल भवरदार, भन्दा आजूराम चुने गये। श्योराण को मन्त्री तथा
far vो बनाया गया। इस प्रकार निर्वाचन सम्पन्न होने पर सदस्यों ने परामर्श किया किया
परमानन्द शती से पुन: गुरुकुल आने की प्रार्थना की जाए तथा मुख्याधिष्ठाता पद पुनः उनको मौप दिया
।वामी जी उस समय अमृतसर में सदस्यों को प्रार्थना पर थे पुन: गल में आ गये। स्वामी जी इस
समय तक गुरुकुल के लिए ३१०१७ रुपये संग्रहित कर चुके थे।इनदिनों छातरों के प्रवेश सम्बन्ध में भी स्वल्प
का परिवर्तन कर दिया गया था कि प्रवेश के समय छा्रों से लिए गये पचास रुपये गत छोड़ने पर भी न
सौर जाएं तथा आगामी शार्क तोन मास का लिया जाया करे।
सत्प हो कहा गया है- शरीरं व्याधि मन्दिरम्। स्वामी परमानन्द जी पुन: गुरुकुल में आकर पूर्व
सेवा करने लगे थे किन्तु उनको मधुमेह मे आक्रान्त कर लिया। अतः वे चिकित्साधं संदशहर में मनोहरलाल
जोधिकसक के पास चले गये। चिकित्सक महोदय ने अत्यन्त उदारता से स्वामी जी को चिकित्सा की
जिसका सभी ने आभार मारा। ठाकुर हरफूलसिंह ऐरी रामगोपाल जी मे समिति की ओर से बुलन्दशहर जाकर
स्वामी जी से भेंट की।

अतिवृष्टि का प्रकोप-१९३३ ई० में समस्त रोहतक जिले को अतिवृष्टि के रूप में दैयीय विपति का
सामना करना पड़ा। वर्षा की बाढ़ का जल प्रलयंकर रूप धारण करके रोहतक निवारियों को दुबो रहा था।
लगातार वर्षा तथा बाढ़ के पानी के कारण मकान ध्वस्त हो गये थे। अनेक पशु तया मनुष्य भी बाद के आवेग
में बह गये थे। खेतों में पानी भरा रहने के कारण फसलें नष्ट हो चुकी थी। यह प्रकृति का भीषण प्रकोप था।
गुरुकुल भी इस संकट से अहता न रहा। यहां भी चारों ओर पानी ही पानी था। जिससे गुर्कुत्तवासियों की
दिनचर्या में तो बाधा आ ही गयी, गुरुकुल के भवन भी क्षतिग्रस्त हो गये थे। गुरुकुल पहले ही अर्थसंकट में
चल रहा था। यह एक और गण्डस्योपरि स्फोटः वात पीड़ा घुटने के फोड़े पर एक और फोड़ा हो गया।
उस संकट से उबरने के लिए गांवों में उपदेशक तथा भजनीक धनसंग्रहार्थ भेजे गये तथा अन्य स्थानों
से दानी व्यक्ति से धनसंग्रह का हल किया गया। सेठ जुगलकिशोर बिरला ने दो सौ रुपये तथा सेठ दीपचन्द

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