जिसमें रुचि(jsma Ruchi), Part 10

जिसमें रुचि(jsma Ruchi),
 Part 10
र का

५ अपसा १९९८ को विद्यालय अवकाश पे पशात अधिाता चार्मी शीतलानद जी भे देखा कि
१ ६ जप हो । जिस कारण से परफर गरे।
।।१। (५ ) ९४ || || शान ।। 80, कल रहे से वातावरण
1५10।।।।।। ।।।।।।।।।।। ।।।। घर से परामर्श के दोनों को गुरुकुल छोड़ने
५। । ४ ।।।।।।।।।।।।।। । आप एवं व्यवहार मुशल थे। उन्होंने चुछ ऐसी युक्ति
।।। ।।।।। शोर ।। ५ ।। १८३८ को दो पिकासन का आदेश रह कर दिया। यह
।। । । । । ।५।९ भाद ५५: ।। । । ।पना 1 अपनाना पहा जिसके परिणाम स्वरूप ।
१॥५॥ ० दे दो को गुरुकुल रोना पड़ा।
। १।१५।। 1 ।। ३ ५। पाय घसा आ रहा था। ऐसा इसलिए चा कि गुरुकुल की
।।1।। ५ ।। २।। । । ।कसी प्रकार का विरोध में था। सभी परस्पर सौहार्दपूर्वक कार्य
र ४ थे। मोदी इसके विपरीत लक्षण कैसे दिखाई देते हैं तो वह परिवार, संस्था, अया देश शीघ्र ही नष्ट
हो जाते हैं। जैसा कि भीतिकारों मे कहा है-
सरों या भेगरः सर्वे पण्डित मानिनः । त्रीणि तत्र प्रवर्तन्ते दुर्भिक्ष मरण भयम्।।
1। परिवार संस्था, समाज अधशा देश में अब भी व्यक्ति अपने को नेता अथवा सबसे अधिक
समझदार मानने लम आयें तो वहां अकाल, मृत्यु तथा भय उत्पन्न होकर प्रगति रुक जाती है।
गल्फ इजहार में ठीक इसके विपरीत था। वहां न तो किसी ने पदलिप्सा की, न ही एक-दूसरे के प्रति
ईध्य्या, हेष की भाषा तथा न ही अनुचित अधिकार की प्रवृत्ति देखी गई। यही कारण था कि स्वामी ब्रह्मानन्द,
गा। परमानन्द तथा स्वामी शीतलानन्द ये तीनों संन्यासी परस्पर अत्यन्त आदर तथा प्रेम के साथ गुरुकुल की
से कर रहे थे। कभी इस गुरुकुल के वे दिन भी थे जब यह वीरान पड़ा था। न तो यहां अध्यापक थे तथा न
छात्र। केवल कुछ कमरे स्मारक रूप में शेष े। स्वामी परमानन्द सरस्वती ही वह व्यक्ति थे जिन्होंने उस
अवस्था से गुरुकुल का उदार करके इसे उस्तत अवस्था में पहुंचाया था।
इसके अतिरिक्त इस कार्य में उनके परम सहयोगी रहे हैं पं० ब्रह्मानन्द, जो आगे चल कर स्वामी
अानन्द बने। इस लम्बे अन्तराल में स्वामी ब्रह्मानन्द गुरुकुल के आचार्य, मुख्याधिष्ठाता तथा संरक्षक पदों पर
कार्य कर चुके थे। महत्व पद का नहीं, कार्य करने का था। स्वामी ब्रह्मानन्द की सेवाओं को देखते हुए सभी
एवं कल वासियों ने उनको अपना कुलपति बना कर गौरव का अनुभव किया। उक्त तीनों संन्यासियों के अलावा
स्वामी मङ्गला नंद सरस्वती ने भी गुरुकुल को सदा सहायता देते रहने का वचन दिया। इस स्वच्छ वातावरण में
अधिष्ठाता स्वामी शीतलानन्द जी ने मिग्न नियम गुरुकुलवासियों के लिए बनाए।
१. खान, भोजन आदि के लिए सभी के लिए समान नियम हैं। कोई भी व्यक्ति चाहे वह रोगी अथवा

अभ्यागत ही क्यों न हो, पाकशाला से स्वयं लाकर भोजन न करे। यदि किसी के लिए पृथक् भोजन
आवश्यक हो तो उनके लिए मुख्याधिष्ठाता से आज्ञा लेना अनिवार्य है।
अध्यापन कार्य में अध्यापकों तथा छात्रों द्वारा दैनिक नियम एवं सिद्धान्तों का उद्ंघन न किया जाए।
स्नान, आहार, विहार आदि में अध्यापक तथा ब्रह्मचारी सदा साथ रहें।

१०८

Post a Comment

Please do not inter any spam link in the comment box

नया पेज पुराने