जन्म स्थान(janam sathan)

जन्म स्थान
हरियाणा प्रदेश के रेवाड़ी जिला में झज्जर रोहतक राजमार्ग पर
स्थित सीतापुर ग्राम में एक साधारण से परिवार में 15 जनवरी सन्
1906 को महाशय हीरालाल जी का जन्म हुआ।

इनके दादा का नाम श्री सालगराम जी था। पिता का नाम श्री
देवकरण जी और माता का नाम रमती चन्दो देवी था। अनुज भ्राता
चिरंजीलाल जी थे। महाशय जी की माता जी पौराणिक ख्यालों की थी।
5 वर्ष की अल्पायु में जब ये बचपन की उछल-कूद के दौर से गुजर रहे
थे कि पिता जी का स्वर्गवास हो गया। जब 13 वर्ष की आयु में कुछ पढ़ने
लिखने को अग्रसर थे तो परिवार में माताजी, दादा जी और अनुज भ्राता
रह गये। कपड़ों की सिलाई करके परिवार का गुजारा बड़ी मुश्किल से
हुआ करता था। संकट की इस घड़ी में घर के हालात ऐसे हुए कि मात्र
अक्षर ज्ञान कामचलाऊ पढ़ाई कर सके और विपदा का पहाड़ उस
समय टूट गया जब सभी सहारे छूट गये।

बाधाएं कब बांध सकी है, आगे बढ़ने वालों को।
विपदाएं कब रोक सकी है, मर कर जीने वालों को।।
रोजी रोटी की तलाश
रोजी रोटी की तलाश में अपने मामा जी के यहां सोनीपत चले
गये। वहां कपड़ों की सिलाई का कुछ समय अभ्यास किया। यह घटना
उस समय की है जब अंग्रेजों की जर्मनी से लड़ाई हो रही थी। वे
सोनीपत से लेकर दिल्ली आ गये। दिल्ली क्लॉथ मिल में पाँच आना
रोज में तम्बू की सिलाई करने लग गये। काम करते-2 अंगुली पक गई।
ऑपरेशन हुआ, घर वापिस आना पड़ा। उसी समय दादा जी का भी
स्वर्गवास हो गया। माताजी अकेली रह गई। इसके बाद सिलाई का
काम सीखने हिसार चले गए। वहां पानी लग गया, बीमार हो गये। छ:
माह बाद वहां से भी लौट आये।
परिस्थितियां ही पैदा करती, युग निर्माता श्री कृष्ण को
परिस्थितियां ही मैदां में लाती, गांडीव धारी अर्जुन को।
मत बाट देखना कि कोई रक्षक, आसमान से आयेगा।
अथवा लेकर अवतार 'विष्णु '', भक्तों के प्राण बचाये।।
समय-समय पर मातायें ही, पैदा करती '*हीरालाल 1
जो दे बदल जमाने को, जिनसे भय खाता स्वयं काल।
विवाह संस्कार

महाशय जी के संगी साथी उनको विवाह करा लेने के लिए बाध्य
करते थे क्योंकि जब कोई दूर का साथी उनके पास आता था तो वे उसको
बिना खाना खिलाये नहीं जाने देते थे और खाना बनाना पड़ता था उनको
अपने हाथों से।
महाशय जी का शिष्य रिछपाल सिंह इंदौर नगर में जाकर काम
करने लग गया। उस समय इंदौर शहर में कई अनाथ आश्रम थे। उक्त
शिष्य ने पं. लल्लूलाल सिंह जी से बात शुरू की। पं0 जी ने कहा कि हमारे
आश्रम में कई सुशील महिलाएं व लड़कियां है तुम महाशय जी को बुला लो।
पत्र व्यवहार के अनुसार महाशय जी वहां पहुंचे और एक अनाथ कुमारी
लड़की को सौभाग्य प्राप्त हुआ।
उस देवी ने महाशय जी का बड़ा साथ दिया। अतिथियों को कभी
भूखा नहीं जाने दिया।
फिर स्थाई दुकान रेवाड़ी में की वहां फड पर बैठकर सिलाई करने
लगे। उन्होंने अनेक विपदाओं को झेला। रोजाना कच्चे रास्ते से मस्तापुर
से
लगभग 10 कि.मी. पैदल ही आना जाना करने लगे। कई वर्षों तक रेवाड़ी
कार्य करते रहे।
आर्य समाज में प्रवेश
शास्त्रार्थ महारथी पं0 रामचन्द्र जी देहलवी रेवाड़ी आर्य समाज
मन्दिर में पधारे हुए थे। वहां शास्त्रार्थ सुना और विधर्मियों को जब हराया ।
तो
महाशय जी के जीवन ने एक नया मोड़ ले लिया और आर्य समाज में प्रय
किया। वैदिक धर्म प्रचार की उनकी चाह और ऋषि मिशन के लिए उन
उत्साह बैचेन कर रहे थे। महर्षि दयानन्द जी के बताये सन्देश का प्रचार
करने में जुट गये। वैदिक धर्म के प्रति उनकी दृढ़ आस्था, संकल्प

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