गांधी जी की हत्या(Gandhi ki hatya), part6

गांधी जी की हत्या(Gandhi ki hatya),
 part6
अपनी मोर ही इसे ले चल । मन तो एक ही है न ! जब यह प्रम को
* दिया, तो फिर यह और कहा जायेगा ? कबीर कहता है
कबिरा यह मन एक है, चाहे जहाँ लगाय ।
भावे प्रभु की भक्ति कर, भावै विषय कमाये ।।
जब गायत्री-मन्त्र द्वारा इसे प्रभु में लगा दिया, उसी के हवाले
कहना चाहिए कि
सब-कुछ कर दिया, तो फिर उसी के होकर, हर समय उससे यही
नैनों की कर कोठरी, पुतली पलंग बिछाय।
पलकों की चिक डालकर, पिय को लेउँ रिझाय ॥
जब एक बार अपनी बुद्धि तथा मन प्रभु के अर्पण कर दिया तो
फिर प्रभु की आज्ञा के बिना वह कोई और विचार अपने अन्दर ला
हो
नहीं सकेगा। जब गायत्री का पाठ करते हुए भगवान को भू
प्राण-प्यारा कह दिया, तो फिर प्रभु के बिना हमारे प्राण रहेंगे कैसे ?
जब किसी का प्राण-प्यारा बिछड़ जाता है, तो उसके विरह में जो
प्रावस्था उसके प्रेमी की होती है, वही अवस्था भगवान की भावना से
मूलमात्र दूर हो जानेवाले भक्त की भी हो जाती है। विरह का अर्थ
है अपने प्रियतम के प्रेम पर मर-मिटने की लगन । एक कवि का कथन

में
उर दाह, प्रवाह दृग, रह-रह निकले आह ।
मर मिटने की चाह हो, यही विरह की राह ॥
अरस्तु गायत्री की साधना करनेवालों को मरने की आवश्यकता
पड़ती, अपितु उनमें गायत्री-जप से तथा तदनुकूल आचरण करने
की
(एक नया जीवन प्रा जाता है । हा, स्वाध्याय के इस अंग से, भक्ति

एक प्रद्भुत तरंग से, भक्त तरंगित हो उठते है ।

ईश्वर-प्रणिधान
पाँचवाँ नियम ईश्वर-प्रणिधान है । इसका भाव यह है कि जो भी
का कब जाएँ, फल-सहित जन सारे कर्मों को ईश्वर के अप्षण कर
दीपा जाए । इसी को भक्ति-विशेष का नाम भी दिया जाता है
यह नियम पाँच नियमों का प्राण है। इसी एक नियम को धान र
लेने से समाधि की सिद्धि दाई गई है
मेरा मुझमें कुछ नहीं, जो कुछ है सब तोर।
तेरा उनको सौंपते, क्या लागे है नोट
देद ३१15 में भक्त भगवान से निवेदन करता है

ते अपि कर्म

नरेन आप हो के अर्पन हों, आप ही के लिए हो !'
तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान का दांत योगदर्शन में तीन
स्थानों पर पाया है। एक ठो साधनपाद के पहले ही सूत्र में, वह इन
तीनों को क्रिया-योग (प्रमली योग) का नाम दिया गया है; और दूसरे
साधन पाद के इ२ओ सूत्र में । यहाँ इन तीनों के पहले शोच औ्र सन्तोष
को नी जोड़ दिया गया है। भगवान पतंजलि की दृष्टि में
स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान का विशेष महत्व है। उन्होंने प्रण
योगदर्शन में इसका दो बार वर्णन किया है और इसमें ईद-प्रनिधान
का और नी बढ़कर महत्व है। गीता में भगवान श्री कृष्ण अजुन उ
कहते हैं-=

यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।
यत् तपस्यसि कौन्तेय ! तत्कुल्ब मदर्पणम्

गीता ६।२७ ॥
कुन्ती-पुत्र! तुम जो कार्य करो, भकण करो, यज्ञ और
कुरो, वह मद मेरे (परमेश्वर के) ही अर्पण करो 1*

यही ईश्वर प्रणिधान है। ईश्वर-प्रणिधान को भावना रखन
भूत फिर जो भी काम करेगा, पूरी सावधानी से करेगा। वह जा
है कि यह कर्म प्र इसका फल प्रभु-दर्शन हो जाना है। 3र
हमने किसी बड़े राज्याधिकारी या साधु-संत-महात्माओं को
कोई वस्तु, वस्त्र, फल या मिष्ठान्न मेंट करना हो तो प्रयत्न यही है,
कि उत्तम-से-उत्तम वस्तु दा जायफल कच्चा या गला-सड़ा न ही.
मिठाई समुद्र घी का हो। यह वस्तु महाराज की भेंट है। अच्छी-8
इंड कर ले चलो। जब मेंट भगवान को करनी हो, तो भी क्या

Post a Comment

Please do not inter any spam link in the comment box

नया पेज पुराने