गांधी जी की हत्या(Gandhi ki hatya), part5

गांधी जी की हत्या(Gandhi ki hatya), 
Part5
ही वेद में स्त्रियों का अधिकार माना है। जब वेद-मन्त्रों की द्रष्टा
ऋषिकाएँ भी हुई हैं, तब इनके वेद पढ़ने के अधिकार पर अँगुली कौन
उठा सकता है ? फिर अनेक ब्रह्मवादिनी देवियों का वर्णन इतिहास
में आरती है । 'महाभारत' के शल्यपर्व में एक तपस्विनी का इतिहास
आया है, जो वेदाध्ययन करनेवाली और योग-सिद्धि को प्राप्त थी ।
इसका नाम 'सिद्धा' था। भरद्वाज की पुत्री श्रुतावली वेद की पूरी
पण्डिता थी। भक्त शाण्डिल्य की पुत्री श्रीमती' निरन्तर वेदाध्ययन
में
प्रवृत्त रहती थी। 'शिवा' नामक ब्राह्मणी वेदों में पारंगत थी । इसी
प्रकार भारती, मैत्रेयी, गार्गी, सुलभा, द्रौपदी, वयुना, धारिणी, वेदवती
आदि कितनी ही देवियों का वर्णन प्राणी है, जो वेद पढ़ती थीं । वेदवती
की तो चारों वेद कण्ठाग्र थे। यही नहीं, अपितु देवियों को ब्रह्मा की पदवी
भी मिलती थी। जब चारों वेद पढ़ने का अधिकार देवियों को प्राप्त
है, तो क्या गायत्री-मन्त्र वेदों के बाहर है ?
पुराणों ने भी स्त्रियों को अधिकार दिया है कि वेद-मन्त्र ग्रहण
करे । भविष्य पुराण' के उत्तरपर्व ४1१३ में लिखा है
या स्त्री बत्रा वियुक्ति त्वचा संयुता शुभम।

सा च मन्त्रान् प्र गृह्णातु सभत्र संज्ञा ।।
श्री-
उत्तम श्री चरण वाली विधवा स्त्री वेद-मन्त्रों को ग्रहण करे और
| स्त्री अपने पति की अनुमति से मंत्रों को ग्रहण करे ।"
वसिष्ठ स्मृति २१।७ में लिखा है-
यदि स्त्री के मन में पति के प्रति इभ आये तो उस पाप का
छती है ।''
प्रायदिचत्त करने के साथ १०८ बार गायत्री-मन्त्र फे जपने से वह पवित

ऐत अनेक प्रमाण है, परन्तु विस्तार-भय से थे यहां लिखे नहीं
जाते । ऊपर से प्रमाण ही पर्याप्त है जिससे सिद्ध होता है कि जो मठ-
पारी देवियों को गायत्रो-जप से रोकते हैं थे थेद, शास्त्र, पुराण, इति-
छास आरती राजा से मुंह मोड़ते हैं।
गायत्री मंत्र यह है
ओसामु भूभभ ा स्थः । तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। पियो |
इस पषित मन्त्र की व्याख्या में कितने ही ग्रन्थ लिखे जा चुके ैं ।
पर भी कितने और लिखे जाएंगे; परन्तु इस मन्त्र को पूर्ण
बास्पा फिर भी न हो सकेगी, क्योंकि यह चार वेदों का सार
साधकों ने इसका जाप करना है वे बड़े-बड़े ग्रन्थों को सामने नहीं रह
सकते और बिना भावार्थ के भी जप अधिक लाभ नहीं पहुँचाता। त्रय
करनेवाले को ज्ञात होना चाहिए कि मैं भगवान के समक्ष बैठा हश्रा
क्या कह रहा हैं, उस प्रियतम से क्या निवेदन किया जा रहा है और
कौन-सी मांग उसके सामने रखी जा रही है।
मैं तो गायत्री-मन्त्र को आत्मसमर्पण का मन्त्र समझता हैं। जिस
प्रकार एक युवती अच्छी तरह जानती हुई विवाह-मण्डप में पवित्र
अग्नि के सामने बैठी पूर्ण निश्चय के साथ अपने पतिदेव के आगे अपने
आपको समर्पण करती हुई, पति को अपना वर बनाती है, इसी प्रकार |
गायत्री मन्त्र का जप करनेवाला अपने प्रियतम से कहता है कि ह
प्यारे, मैं तेरे सुन्दर शुद्ध तेज का ध्यान करता हूँ । तू ही वरने योव
है।
तू, जो कि सारे जगत् का उत्पन्न करनेवाला है, सबको प्रका
देने वाला है। प्राण-प्यारे ! दुखों को दूर करने और सुखों को देनेवान
रक्षक और स्वामिन् ! अपनी बुद्धि को तेरे अर्पण करता हूँ ।
अपनी ओर ले चल !'
जब एक देवी एक बार अपने पति को वर लेती है, तो फिर थ
सदा के लिए उसी की हो जाती है। गायत्री-मन्त्र में उप सिक।
साधक भगवान को अपना वर चुनता है और अपने-आपको
सुपुर्द कर देता है । तब उसके हृदय रुपी सिंहासन पर सिवाय ज
प्यारे प्रभु के और कोई बात ही नहीं सकता । यदि प्रभु के अ्रतिfता
कोई और उसमें प्राण है तो जैसे देवी का पतिव्रत धर्म कलुवित/
जाता है, वैसे ही भक्त की भक्ति को भी कलंक लगता है। गाना/
मंत्र का जप करते-करते भवत बार-बार प्रभु से यही याचना करता
कि मैं तेरा हो चुका । मेरी बुद्धि को नकेल तेरे हाथ में है

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