सहमति की शक्ति(shamati ki sakti)

सहमति की शक्ति(shamati ki sakti)

सहमति वह दिव्य शक्ति है जो आत्म मनोबल बढ़ाकर, आपके जीवन को सार्थक
आयाम देती है। जीवन को शक्तियों से समृद्ध करने के इस क्रम में आपको ‘पावर
ऑफ एग्रीमेंट अर्थात सहमति की शक्ति बढ़ानी है।

आपने देखा होगा कि जिन चीज़ों पर आप सहमत हो जाते हैं, उन पर
कार्य करना कितना सफल हो जाता है। आपके जीवन में जो-जो बातें चल रही
हैं, आपको जो भी मिल रहा है, उन्हें सहमति देकर आप ईश्वर को अनुमति देते
है। जब आप सहमत होते है तब दु:ख नहीं होता, प्रतिरोध नहीं होता। जब आप
असहमत होते हैं, तब ही दु:ख आता है। असहमति ही दु:ख का आरंभ बिंदू है।

जीवन में कोई घटना हुई और आपके मन में विचार आए, ‘मेरे साथ ही
ऐसा क्यों हुआ... काश, मुझे पहले कोई संकेत मिलता... मैं तो सबका भला
करता है, फिर मेरे साथ यह हादसा क्यों हुआ... यह न्याय नहीं है... यानी
आप घटना के प्रति अपनी सहमति दिखा रहे हैं। घटनाओं के प्रति असहमति
यानी ईश्वर के प्रति असहमति । असहमत होकर आप दु:ख को अपने जीवन
आमत्रित करते हैं। जैसे ही आप सहमत होते हैं तो दु:ख को किनारा मिलना बंद
हो जाता है और वह विलीन होने लगता है।

यदि आप जीवन की हर घटना में सहमति की मुहर लगाएँगे तो आप अपूर्व
अवस्था तक पहुँच जाएँगे । कैसे? आइए, समझते हैं।
आध्यात्मिक विकास के क्रम में इंसान तीन अवस्थाओं से होकर गुजरता है।

पहली - शिव अवस्था यानी पूर्व अवस्था
दूसरी - परेशान अवस्था यानी बंद अवस्था
तीसरी अपूर्व अवस्था

इंसान अक्सर बीच की अवस्था में अटक कर रह जाता है ।।

ईश्वर की उपस्थिति में इंसान के जीवन में एक घटना होती है यानी समडिा।
कि उसे एक लिफाफा मिलता है, जो कि दोनों तरफ से खुला है। इंसान उस
लिफाफे को बंद करके उस पर अपनी मुहर लगा देता है। मुहर लगाकर वह
मुहरसिंग बन जाता है।

मुहरसिंग, सींग में अटका हुआ सींग है, जो सहमति में रुकावट डालता है।
वह घटनाओं के मुक्त प्रवाह (फ्री फ्लो) में बाधा बनता है। लिफ़ाफे में से चीजें
गुजरती हैं इसलिए लिफाफे को बंद न करते हुए, अगली चीज को जीवन में आने
का मौका देना चाहिए। अगर इंसान तरेत लिफाफे को सील कर देता है। हालाँकि
होना यह चाहिए कि लिफाफे में से जो भी चीज़ आना चाहे, उसे आने के लिए
सहमति देनी चाहिए। लिफाफे को सील कर दिया या महर लगा दी तो नई चीज
(कृपा) आनी बंद हो जाती है। ईश्वर उस लिफ़ाफे में इंसान के लिए एक पत्र
डालना चाहता है मगर वह रुक जाता है क्योंकि लिफ़ाफे को बंद कर दिया गय
है। मुहर लगाने यानी असहमति दिखाने के कारण ईश्वर आपको जो देना चाहता
है, वह दे नहीं पाता। जब आपको यह बात स्पष्ट होगी तब आप तुरंत ईश्वर से
माफ़ी माँगेंगे और लिफाफा भी खोल देगे।

आइए, देखें कि असहमति की यह मुहर आखिर लगती कैसे है?

ईश्वर की उपस्थिति में कोई घटना हुई और आपने कहा कि यह दुस
हुआ। आपने चाहे मुँह से न कहा हो किंतु उस घटना से आपके मन ।
नकारात्मक भावना आई, उसने घटना के बुरा होने पर मुहर लगा दी। जब
परिस्थिति में उस विचार को राजस्थान में लेकर जाना चाहिए और स्वयं से वह ।
सवाल पूछना चाहिए कि 'इस घटना में अच्छा हुआ या बुरा हुआ, यह मैंने किस ।
दृष्टिकोण से कहा?'

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